हरिद्वार में 5211 किलोग्राम वजनी विश्व के विशाल पारद शिवलिंग की भव्य प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न, संतों के आशीर्वाद से गूंजा आध्यात्मिक वातावरण

ममता चौहान (मुख्य संपादक) हरिद्वार

हरिद्वार, 17 जून। धर्मनगरी हरिद्वार स्थित श्री साई शिव गंगा धाम में 5211 किलोग्राम वजनी विश्व के विशाल पारद शिवलिंग की तीन दिवसीय प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव वैदिक मंत्रोच्चार, धार्मिक अनुष्ठानों एवं दिव्य आध्यात्मिक वातावरण के मध्य भव्य रूप से सम्पन्न हुआ। इस ऐतिहासिक आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों से आए 2000 से अधिक श्रद्धालुओं, संत-महात्माओं, साधकों एवं गणमान्य अतिथियों ने भाग लेकर भगवान शिव का पूजन-अर्चन किया तथा संतों का शुभ आशीर्वाद प्राप्त किया।


समारोह गुरु गोरक्षनाथ महाराज की पावन परंपरा, गिरनार के पूज्य पीर योगी महंत सोमनाथ बापू के आशीर्वाद तथा पद्मभूषण डॉ. विजय भटकर के मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ। आयोजन का मूल उद्देश्य विश्व शांति, मानव कल्याण, आध्यात्मिक चेतना के जागरण तथा सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के संदेश को जन-जन तक पहुंचाना रहा।


दस वर्षों की साधना और अनुसंधान का परिणाम


ध्यान गुरु रघुनाथ गुरुजी द्वारा लगभग दस वर्षों की कठोर साधना, पारद विज्ञान के गहन अध्ययन एवं अनुसंधान के उपरांत इस विशाल पारद शिवलिंग का निर्माण कराया गया। शिवलिंग के निर्माण में पारा, चांदी, स्वर्ण तथा 108 प्रकार की दुर्लभ जड़ी-बूटियों के अर्क का उपयोग किया गया है।


रघुनाथ गुरुजी ने बताया कि यह पारद शिवलिंग केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि ध्यान, सकारात्मक ऊर्जा, आध्यात्मिक उन्नयन और मानव चेतना के जागरण का एक दिव्य केंद्र है। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति के संरक्षण और आध्यात्मिक जागरण के लिए ऐसे आयोजन समय-समय पर होते रहना आवश्यक हैं।


संतों के सान्निध्य से धन्य हुए श्रद्धालु


प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में देश के अनेक प्रतिष्ठित संतों एवं धर्माचार्यों की गरिमामयी उपस्थिति रही। परम पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जी महाराज, परम पूज्य श्री सुधांशु जी महाराज, परम पूज्य स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज, परम पूज्य स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज, परम पूज्य स्वामी रविन्द्र पुरी जी महाराज, साध्वी ऋतंभरा जी, आचार्य मनीष जी (HIIMS) सहित अनेक संतों ने श्रद्धालुओं को धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक जीवन के महत्व का संदेश दिया।
संतों ने अपने आशीर्वचन में कहा कि सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि मानवता, सेवा, करुणा और विश्व बंधुत्व का मार्ग है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्रहित के कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया। उपस्थित भक्तों ने संतों का आशीर्वाद प्राप्त कर स्वयं को धन्य अनुभव किया।


विशिष्ट अतिथियों की रही सहभागिता


समारोह में विश्व हिन्दू परिषद के संरक्षक श्री दिनेश चंद्र जी, सांसद राघव चड्ढा, गंगा सभा अध्यक्ष नितिन गौतम, राज्य मंत्री सहित अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे। सभी अतिथियों ने इस आयोजन को आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक समरसता को मजबूत करने वाला ऐतिहासिक कार्यक्रम बताया।


आयोजन की सफलता में राजीव बंसल की महत्वपूर्ण भूमिका
इस विशाल आयोजन को सफल बनाने में उद्योगपति एवं समाजसेवी राजीव बंसल का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। आयोजन की व्यवस्थाओं, समन्वय और सेवा कार्यों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।
राजीव बंसल ने कहा कि साईं बाबा की कृपा से उन्हें इस दिव्य आयोजन का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने इसे अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अनुभव बताते हुए कहा कि सेवा और श्रद्धा के माध्यम से ही मानव जीवन सार्थक बनता है।
ध्यान गुरु रघुनाथ गुरुजी ने भी समारोह के समापन अवसर पर सभी संतों, श्रद्धालुओं, स्वयंसेवकों एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त करते हुए राजीव बंसल सहित सभी सहयोगियों के योगदान की सराहना की।


समाजसेवा और दिव्यांग सशक्तिकरण का भी संदेश


आध्यात्मिक गतिविधियों के साथ-साथ रघुनाथ गुरुजी दिव्यांग आत्मनिर्भरता, महिला किसान सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण तथा सामाजिक नवाचार के विभिन्न अभियानों से भी जुड़े हुए हैं। दिव्यांग इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (DICCAI) के माध्यम से दिव्यांगजनों को स्वरोजगार एवं आर्थिक सशक्तिकरण से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमित अग्रवाल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।


सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार का बना संदेश


तीन दिवसीय इस भव्य आयोजन ने श्रद्धालुओं के मन में आध्यात्मिक चेतना, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक गौरव का नया संचार किया। संत-महात्माओं ने अपने आशीर्वाद में कामना की कि ऐसे धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजन निरंतर होते रहें, जिससे सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार हो, समाज में सद्भाव बढ़े और विश्व शांति का मार्ग प्रशस्त हो।
समारोह के समापन पर “ध्यान से शांति, शांति से सद्भाव और सद्भाव से विश्व कल्याण” का संदेश दिया गया। श्रद्धालुओं ने इसे मानव कल्याण, आध्यात्मिक जागरण और सनातन संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं प्रेरणादायी पहल बताया।

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