हरिद्वार में 21 फुट ऊंची भगवान शिव की भव्य प्रतिमा का अनावरण, शिवलिंग युक्त मंदिर की हुई स्थापना

ममता चौहान
हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में सोमवार को भगवान शिव की भक्ति और आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के गेस्ट हाउस, ओम पुल के निकट स्थित परिसर में भगवान शिव की 21 फुट ऊंची भव्य प्रतिमा का विधि-विधान के साथ अनावरण किया गया। इसी धार्मिक आयोजन के दौरान परिसर में शिवलिंग युक्त भगवान शिव के मंदिर की भी स्थापना की गई। कार्यक्रम जगद्गुरु शंकराचार्य परम पूज्य स्वामी अनंतानंद जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित हुआ।
भव्य प्रतिमा के अनावरण और मंदिर स्थापना के अवसर पर उत्तर प्रदेश के सिंचाई मंत्री श्री स्वतंत्र देव सिंह विशेष रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम में वैदिक मंत्रोच्चार, विधि-विधान और पूजा-अर्चना के बीच भगवान शिव का पूजन किया गया। जैसे ही धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ, पूरा परिसर ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं और उपस्थित संत-महात्माओं ने भगवान शिव की आराधना कर सुख, शांति और लोककल्याण की कामना की।


सनातन संस्कृति और आस्था का प्रतीक है शिव प्रतिमा


इस अवसर पर सिंचाई मंत्री श्री स्वतंत्र देव सिंह ने भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हुए कहा कि हरिद्वार जैसी पावन धर्मनगरी में भगवान शिव की भव्य प्रतिमा और मंदिर की स्थापना श्रद्धा, आस्था तथा सनातन संस्कृति के प्रति समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव सनातन परंपरा के आधार स्तंभ हैं और उनकी आराधना मनुष्य को सत्य, सेवा, संयम, सद्भाव तथा धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव की भव्य प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी। हरिद्वार में मां गंगा की पावन धारा के निकट स्थापित यह धार्मिक स्थल श्रद्धालुओं के लिए आस्था और आध्यात्मिक गौरव का नया केंद्र बनेगा।


सत्य, धर्म और संस्कारों में निहित है सनातन की शक्ति


जगद्गुरु शंकराचार्य परम पूज्य स्वामी अनंतानंद जी महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि हरिद्वार की पावन धरती का कण-कण मंदिर के समान पवित्र है। यहां सनातन संस्कृति निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर हो रही है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति या समाज का मूल्यांकन केवल उसकी संख्या अथवा शक्ति के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
रामायण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि रावण की सेना में हजारों-लाखों सैनिक थे, जबकि भगवान श्रीराम की सेना संख्या में सीमित थी। इसके बावजूद विजय अंततः सत्य और धर्म की हुई। उन्होंने कहा कि जहां सत्य है, वहीं सनातन है और जहां सनातन है, वहां विजय सुनिश्चित है।
स्वामी अनंतानंद जी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म की शक्ति उसकी विशालता में नहीं, बल्कि सत्य, त्याग, धर्म, संस्कार और सदाचार जैसे मूल्यों में निहित है। भगवान शिव की यह भव्य प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को अपनी आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का कार्य करेगी।


विधि-विधान से हुआ पूजन-अर्चन और मंदिर स्थापना


कार्यक्रम के दौरान विद्वान आचार्यों द्वारा विधि-विधान एवं मंत्रोच्चार के साथ भगवान शिव का पूजन-अर्चन किया गया। इसके पश्चात शिवलिंग की स्थापना कर मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराया गया। वैदिक मंत्रों की गूंज और धार्मिक वातावरण के बीच श्रद्धालुओं ने भगवान शिव के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
धार्मिक आयोजन में विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम ने पूरे परिसर को भक्तिमय वातावरण में परिवर्तित कर दिया।
संत-महात्माओं और गणमान्य लोगों की रही मौजूदगी
इस अवसर पर महामंडलेश्वर यतींद्रानंद महाराज, एसडीओ श्री भारत भूषण, मुख्य पुजारी पंडित विनय मिश्रा, जेई श्री कृष्ण कुमार सैनी, एकान श्री विकास त्यागी, महंत दिनेश दास महाराज सहित उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारी मौजूद रहे।
धार्मिक आयोजन में संत-महात्माओं की उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा और बढ़ गई। श्रद्धालुओं ने भगवान शिव की भव्य प्रतिमा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और मंदिर में माथा टेककर आशीर्वाद प्राप्त किया।


धर्मनगरी को मिला आस्था का नया केंद्र


हरिद्वार में मां गंगा की पावन धारा के निकट भगवान शिव की 21 फुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण और शिवलिंग युक्त मंदिर की स्थापना श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक आकर्षण का नया केंद्र बन गई है। भव्य प्रतिमा की दिव्यता और धार्मिक अनुष्ठानों ने पूरे वातावरण को शिवमय बना दिया।
आयोजन ने धार्मिक आस्था, सनातन संस्कृति और सामाजिक सद्भाव का संदेश प्रस्तुत किया। श्रद्धालुओं के बीच भगवान शिव की भव्य प्रतिमा को लेकर विशेष उत्साह दिखाई दिया और उपस्थित लोगों ने इस धार्मिक पहल को हरिद्वार की आध्यात्मिक पहचान को और मजबूत करने वाला कदम बताया।

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