ममता चौहान
परमार्थ निकेतन से कथा मर्मज्ञ पूज्य रमेशभाई ओझा जी की भावपूर्ण विदाई*
*🌸सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा, दिव्य गंगा आरती, हवन और तीर्थाटन का अलौकिक अनुभव*
*🌺हरित, संस्कारित और सतत भविष्य के निर्माण हेतु संकल्प*
*💥ग्रीन कथा, ग्रीन कल्चर, ग्रीन फ्यूचर का
ऋषिकेश, 12 मई। हिमालय की गोद में बसे पावन तीर्थ परमार्थ निकेतन में बीते सात दिनों तक भक्ति, ज्ञान, प्रेम और परमात्मा के दिव्य स्पंदनों की जो अविरल प्रवाहित हो रही ज्ञान गंगा के समापन के पश्चात पूज्य भाई श्री जी ने परमार्थ निकेतन से विदा ली।
श्रीमद्भागवत कथा के पावन अवसर पर भारतीय संस्कृति, सनातन संस्कारों, ऋषि परम्परा, गौ संरक्षण, प्राकृतिक कृषि और आध्यात्मिक चेतना पर चिंतन-मंथन हुआ जिसने प्रत्येक हृदय को भीतर तक स्पंदित किया। पूज्य स्वामीजी की दिव्य वाणी ने सभी को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने और जीवन को सेवा, साधना एवं संस्कारों से जोड़ने की प्रेरणा दी। गंगा तट पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने पर्यावरण संरक्षण, पौधारोपण और हरित भविष्य के निर्माण हेतु सामूहिक संकल्प लिया।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि जब संतों की वाणी गंगा के तट पर गूंजती है तो युगों युगों की चेतना जागृत होती है। उन्होंने कहा कि पूज्य रमेशभाई ओझा जी की कथा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानवता को प्रेम, करुणा, सेवा और संस्कारों से जोड़ने का एक दिव्य माध्यम है। कथा के प्रत्येक प्रसंग ने श्रद्धालुओं के अंतर्मन में शांति, संतुलन और ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव जागृत करने में मदद की है।
पूज्य रमेशभाई ओझा जी ने कहा कि भागवत केवल ग्रंथ नहीं, जीवन जीने की कला है। जब मनुष्य अपने भीतर प्रेम, करुणा और सेवा को जागृत करता है तभी वह वास्तव में भगवान के निकट पहुँचता है। उन्होंने कहा कि गंगा केवल नदी नहीं, वह भारत की आध्यात्मिक चेतना की धारा है और परमार्थ निकेतन उस चेतना का जीवंत तीर्थ है।


विदाई का क्षण यजमान परिवार और सभी साधकों के लिये अत्यंत भावुक और अविस्मरणीय था। सात दिनों तक देश और विदेश से आये हजारों श्रद्धालुओं ने कथा के साथ-साथ परमार्थ निकेतन की आध्यात्मिक परंपराओं का अनुभव किया। परमार्थ निकेतन में यह सात दिवसीय आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि यह प्रेम, भक्ति, संस्कृति और सनातन मूल्यों का जीवंत उत्सव था। यह केवल सात दिनों की स्मृतियाँ नहीं बल्कि अनगिनत हृदयों में भक्ति की ऐसी ज्योति प्रज्वलित है जो सदैव जलती रहेगी। गंगा के तट पर बीते ये सात दिन उन सभी श्रद्धालुओं के लिये जीवन की अमूल्य आध्यात्मिक निधि बन गये।
यह आयोजन उन दुर्लभ आध्यात्मिक क्षणों में से एक था जिसे केवल हृदय में अनुभव किया जा सकता है।

